असहयोग आंदोलन का भारत की आज़ादी में बहुत ही बड़ा योगदान है। सन 1915 में गांधीजी अफ्रीका से भारत लौट ने के बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने एक नई दिशा कर ली थी। उसके बाद गांधीजी ने 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी, असहयोग आंदोलन के मुख्य उद्देश्य – अंग्रेज सरकार के द्वारा बना ये गए नियमों को तोड़ना और उनके काम में बाधा डालना था।

असहयोग आंदोलन का आरंभ

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और रॉलेट एक्ट के तहत बिना किसी जाँच के लोगो को कारावास की सजा दी जाती थी, इसके विरोध में हर जगह पर आंदोलन चला। इसका सबसे ज्यादा विरोध पंजाब में देखने को मिला, पंजाब में गांधीजी के साथ कई सारे कांग्रेस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। परिस्थितियां तब ज्यादा बिगड़ी जब एक अंग्रेज अफ़सर ने जलियावाला बाग में चल रही सभा पे गोलीबार के आदेश दिया, जिसके वजह से 1000 लोग मारे गए और 1500-1800 लोग घायल हुए, यह घटना से लोगो में अंग्रेजी सरकार विरूद्ध रोष बढ़ गया। यह सब देखते हुए गांधीजी ने कलकत्ता अधिवेशन में अंग्रेज सरकार द्वारा लोगो पे किये गए दमन के खिलाफ असहकार आंदोलन का प्रस्ताव रखा और 1 अगस्त 1920 से असहयोग आंदोलन की शुरूआत हुई।

आंदोलन का असर

आंदोलन को सफल बनाने के लिए गांधीजी के साथ कई सारे लोग जुड़े और सब ने मिलकर लोगो को यह आग्रह किया कि हर सरकारी संस्था और संसाधनों का बहिष्कार करे, उन्हों ने विद्यार्थियों को आग्रह किया कि वो सरकारी स्कूलों और महाविद्यालय का बहिष्कार करे और वकीलों को आग्रह किया कि वो लोग अदालत जाना बंद करदे।

शहरों में असहयोग आंदोलन का असर

लोगो ने गांधीजी और उनके सहयोगी की बातों को सम्मान देते हुए सरकारी चीजें और संस्थाओं का बहिष्कार किया, हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल और कॉलेजों में जाना बंद कर दिया, वकीलों ने अदालतों के भी बहिष्कार किया और शराब की दुकानें बंद कर दी गई।

शहरों में जगह जगह पे विदेशी कपड़ो और कई और विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई, लोग गांधीजी के कहने पर स्वदेशी वस्तुएं और कपड़े ख़रीद ने लगे थे। जिसकी वजह से अंग्रेज सरकार की कपड़ो से हो रही आय में काफी गिरावट दिखाने लगी थी।

ग्रामीण इलाकों में असहयोग आंदोलन का असर

शहरों की तरह ग्रामीण इलाकों में भी असहयोग आंदोलन को बहुत ही अच्छा सहयोग मिल रहा था, लोग अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार करने लगे थे और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने लगे थे।

जो लोग अंग्रेज सरकार के लिए काम किया करते थे, उन्हों ने काम का बहिष्कार कर दिया था, लेकिन ग्रामीण इलाकों के असहकार आंदोलन ने मिजाज अब बदलने लगा था लोग शराब की दुकान, अनाज के गोदामों और कई और सरकारी जगहों पे हमला करने लगे थे और उन पर कब्ज़ा करने लगे थे। जोकि यह आंदोलन की विचारधारा की बिलकुल विरूद्ध था और यह सब वजह अंग्रेज़ो को लोगो पर दमन करने का बहाना मिल रहा था।

असहकार आंदोलन में हुए महत्वपूर्ण घटनाएं

  1. प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का बहिष्कार

असहकार आंदोलन को समाप्त करने के लिए अंग्रेज़ो ने गांधीकी और अली बंधु जैसे कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। उसी समय अप्रैल 1921 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का भारत में आगमन हुआ, जिसका भारत के लोगो ने काले रंग के झंडे दिखाकर बहिस्कार किया और उसके साथ प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन के विरोध में लोगो ने पूरे भारत मे हड़ताल रखी। उसके साथ अहमदाबाद में हुए अधिवेशन में यह आंदोलन को ज्यादा मजबूत और तेज़ करने के लिए लोगो को आह्वान किया गया।

  1. चौरी-चौरा काण्ड

ग्रामीण इलाकों का असहकार आंदोलन अब हिंसक रास्ता ले चुका था, 5 फरवरी 1922 में उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा गांव में लोग हड़ताल पर थे और उनका पुलिस के साथ भिड़ना हुआ और गुस्से हुए भीड़ ने पुलिस चौकी में आग लगा दी, जिसकी वजह से वहां छुपे कई पुलिस कर्मियों की मृत्यु हुई।

आंदोलन समाप्ति के निर्णय

असहयोग आंदोलन बहुत अच्छी तरह से चल रहा था, आंदोलन की वजह से अंग्रेज सरकार को काफी नुकसान हुआ था और सरकार पूरी हिल चुकी थी। लेकिन अचानक से चौरी-चौरा में हुए हिंसा से गांधीजी को बहुत दुःख हुआ, उन्हों ने 12 फरवरी 1922 के दिन बारडोली में हुई कांग्रेस की बैठक में असहकार आंदोलन को समाप्त करने का निर्णय लिया। असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने के निर्णय के बारे में गांधी जी ने यंग इण्डिया में लिखा था कि, “आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहाँ तक की मौत भी सहने को तैयार हूँ।”